शाम का समय है और नदी के किनारे हजारों लोग घुटनों तक पानी में खड़े हैं। हर हाथ में बांस का सूप है, जिसमें मौसमी फल, ठेकुआ और जलता हुआ एक छोटा सा मिट्टी का दीया रखा है। आसमान में सिंदूरी लाली छाई है और सूरज धीरे-धीरे क्षितिज के पार जा रहा है।
दुनिया में एक बहुत पुरानी कहावत है कि 'उगते हुए सूरज को सब सलाम करते हैं।' यानी जब किसी का अच्छा वक्त आता है या कोई शिखर पर होता है, तो सब उसके साथ खड़े होते हैं। लेकिन छठ के घाट पर यह सोच पूरी तरह बदल जाती है।
यहाँ सबसे पहले उस सूरज की पूजा की जाती है जो अस्त हो रहा है। अगली सुबह उगते सूरज की पूजा तो बाद में होती है, पहले शाम को ढलते सूरज को सम्मान दिया जाता है। आखिर हमारी परंपरा में डूबते सूरज को इतना गहरा आदर क्यों दिया गया है?

उगते को संसार पूजता है, छठ में ढलते को पहला सम्मान क्यों?
छठ पूजा का तीसरा दिन, जिसे 'संध्या अर्घ्य' या 'संजहिया अरघ' कहा जाता है, इस पूरे त्योहार का सबसे भावुक पल होता है। इसका सबसे पहला कारण कृतज्ञता यानी आभार व्यक्त करना है।
पूरे दिन जिस सूर्य ने हमें रोशनी दी, धरती की फसलों को पकाया और जीवन की ऊर्जा दी, क्या शाम होते ही हम उसे भूल जाएं? हमारी संस्कृति सिखाती है कि विदाई के समय आभार जताना स्वागत करने से भी ज्यादा जरूरी है।
यह परंपरा हमें जीवन के चक्र का सम्मान करना सिखाती है। सुख और दुख, चढ़ाई और ढलान, यह सब जीवन के हिस्से हैं। अगर हम केवल चढ़ते हुए वक्त का स्वागत करेंगे और ढलते वक्त से मुंह मोड़ लेंगे, तो यह स्वार्थ होगा।
- ढलता सूरज हमें याद दिलाता है कि अंत भी उतना ही सुंदर हो सकता है जितनी शुरुआत।
- यह हमें भरोसा देता है कि जो आज अस्त हो रहा है, वह कल सुबह एक नई रोशनी के साथ फिर लौटेगा।
- यह पूजा हमारे भीतर से बुरे वक्त का डर निकालती है और धैर्य सिखाती है।
देवी प्रत्यूषा की कृपा: ढलती किरणों का आध्यात्मिक रहस्य
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान सूर्य की दो प्रमुख शक्तियां या पत्नियां मानी गई हैं—ऊषा और प्रत्यूषा। सुबह की पहली किरण को ऊषा कहा जाता है, जबकि शाम की अंतिम किरण को प्रत्यूषा नाम दिया गया है।
छठ के तीसरे दिन शाम को दिया जाने वाला अर्घ्य असल में देवी प्रत्यूषा को समर्पित होता है। माना जाता है कि सूर्य की अंतिम किरण में एक अनोखी शांति और समेटने वाली शक्ति होती है।
दिनभर की भागदौड़ के बाद जब प्रकृति शांत होने लगती है, तब प्रत्यूषा रूपी ऊर्जा मन के तनाव को दूर करती है। पुराणों में कहा गया है कि जो व्यक्ति शाम के समय सूर्य की अंतिम किरणों को अर्घ्य देता है, उसके जीवन की चिंताएं और अशांति शांत होने लगती हैं।
प्रकृति और शरीर से जुड़ा पहलू: क्यों दिया जाता है जल में खड़े होकर अर्घ्य?
छठ पूजा पूरी तरह प्रकृति के नियमों के अनुकूल मानी जाती है। इसमें किसी बंद कमरे या मंदिर की जरूरत नहीं होती, बल्कि खुली हवा और बहता हुआ पानी ही इसका मंदिर बन जाता है।
संध्या अर्घ्य के समय व्रती और उनके परिजन कमर तक ठंडे पानी में खड़े होते हैं। शाम के समय जब तापमान गिरने लगता है, तब पानी में खड़े रहने से शरीर का तापमान बाहर के वातावरण के साथ तालमेल बिठाने लगता है।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी ढलते सूर्य की किरणों में पराबैंगनी (UV) किरणों का असर न के बराबर होता है। उस समय सूर्य की लाल और नारंगी किरणें आंखों और त्वचा के लिए बहुत सौम्य मानी जाती हैं।
- पानी में सूर्य की ढलती किरणों का परावर्तन (reflection) आंखों की रोशनी और मन के लिए बहुत शांत माना जाता है।
- शाम के अर्घ्य से शरीर की जैविक घड़ी (body clock) प्राकृतिक चक्र के साथ जुड़ती है।
- नंगे पैर गीली मिट्टी और पानी में रहने से शरीर की नकारात्मक ऊर्जा धरती में समा जाती है।
बुजुर्गों और ढलती उम्र का सम्मान: एक गहरा सामाजिक संदेश
अगर हम छठ पूजा को सिर्फ पूजा-पाठ की नजर से न देखकर समाज के नजरिए से देखें, तो यह बेहद सुंदर सीख देती है। ढलता हुआ सूरज हमारे घर के बुजुर्गों जैसा है।
बुजुर्ग वे हैं जिन्होंने अपनी पूरी जवानी परिवार को सींचने में लगा दी, बिल्कुल उस सूरज की तरह जिसने दिनभर अपनी तपन से सबको जीवन दिया। लेकिन जब इंसान बूढ़ा हो जाता है, तो अक्सर समाज उसे किनारे कर देता है।
छठ पूजा हमें रोकती है और समझाती है कि जो ढल रहा है, वह कमजोर नहीं बल्कि सबसे ज्यादा आदर का हकदार है। शाम का अर्घ्य समाज को यह याद दिलाता है कि अपने माता-पिता और बुजुर्गों का हाथ उस समय सबसे मजबूती से थामना चाहिए जब उनकी उम्र ढल रही हो।
आज के जीवन में इस परंपरा का क्या महत्व है?
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में हम केवल सफलता, नए प्रोजेक्ट्स और बढ़त के पीछे भागते हैं। जैसे ही कोई काम बिगड़ता है या करियर में ठहराव आता है, हम निराश हो जाते हैं।
संध्या अर्घ्य हमें सिखाता है कि हर ढलान का मतलब हार नहीं होता। ढलना केवल कुछ देर का विश्राम है ताकि अगली सुबह दोगुनी ऊर्जा के साथ दोबारा उगा जा सके।
जब आप छठ के घाट पर ढलते सूरज के आगे झुकते हैं, तो आप अपने अहंकार को भी विसर्जित कर रहे होते हैं। यह पूजा हमें यह स्वीकार करने की शक्ति देती है कि जीवन में उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं और हमें हर स्थिति में स्थिर रहना चाहिए।
निष्कर्ष
छठ पूजा का यह अनूठा नियम—कि पहले ढलते को पूजो, फिर उगते को—पूरी दुनिया की संस्कृतियों में बेहद दुर्लभ है। यह हमें सिखाता है कि जीवन केवल पाने का नाम नहीं, बल्कि जो बीत गया उसके प्रति आभार जताने का नाम भी है।
जब हम डूबते सूरज को सिर झुकाकर प्रणाम करते हैं, तो हम कुदरत के इस नियम को स्वीकार करते हैं कि अंत ही नई शुरुआत का बीज है। यह विश्वास हमें मुश्किल दिनों में भी यह भरोसा दिलाता है कि रात चाहे जितनी लंबी हो, सवेरा तय है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
छठ में संध्या अर्घ्य किस दिन दिया जाता है?
संध्या अर्घ्य छठ पूजा के तीसरे दिन, कार्तिक शुक्ल षष्ठी की शाम को दिया जाता है। इस दिन व्रती निर्जला रहकर शाम को डूबते सूर्य को पहला अर्घ्य अर्पित करते हैं।
संध्या अर्घ्य के सूप में कौन-सी चीजें रखी जाती हैं?
बांस के सूप में मुख्य रूप से ठेकुआ, भुसवा, गन्ना, नारियल, डाभ नींबू, हल्दी का पौधा और मौसमी फल रखे जाते हैं, साथ ही एक जलता हुआ दीया भी रखा जाता है।
डूबते सूर्य को अर्घ्य देने से क्या फल मिलता है?
मान्यता है कि ढलते सूर्य यानी देवी प्रत्यूषा को अर्घ्य देने से जीवन के पुराने कष्ट, मानसिक तनाव और रोगों से मुक्ति मिलती है तथा घर में शांति आती है।



