गोकुल की गलियों में धूल उड़ाते हुए जब नन्हे कान्हा अपने सखाओं के संग खेलते थे, तब कोई सोच भी नहीं सकता था कि इस नटखट बालक के भीतर क्या छिपा है। एक छोटा सा बच्चा, जिसके घुंघराले बाल धूल से सने हैं, हाथ में मक्खन की मटकी है और चेहरे पर एक भोली सी मुस्कान।
लेकिन क्या कभी किसी मां ने अपने नन्हे बच्चे के छोटे से मुंह में सूरज, चांद, तारे और बहती नदियां देखी हैं? श्रीमद्भागवत की यह बाल लीला केवल एक कहानी नहीं है, बल्कि यह सिखाती है कि जिसे हम साधारण समझते हैं, उसमें पूरा संसार समाया हो सकता है।

मिट्टी खाने की शिकायत और बाल कृष्ण की मासूमियत
एक दिन बाल कृष्ण अपने बड़े भाई बलराम और दूसरे ग्वाल-बालों के साथ खेल रहे थे। खेलते-खेलते कान्हा ने नीचे गिरी हुई थोड़ी सी मिट्टी उठाकर अपने मुंह में डाल ली। सखाओं ने यह देख लिया और उन्हें कान्हा को छेड़ने का बहाना मिल गया।
बलराम और बाकी सभी बच्चे दौड़ते हुए माता यशोदा के पास पहुंचे। सबने एक स्वर में कहा, 'मैया, देखो तुम्हारे लाडले कन्हैया ने आज छिपकर माटी खाई है।' मां यशोदा यह सुनकर थोड़ी चिंतित और नाराज हो गईं, क्योंकि मिट्टी खाने से बच्चे का पेट खराब हो सकता था।
यशोदा मैया हाथ में एक छोटी सी छड़ी लेकर तुरंत आंगन में पहुंचीं। कान्हा वहीं खड़े होकर अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से मैया को देख रहे थे। मां ने डांटते हुए पूछा, 'क्यों रे कान्हा! तूने मिट्टी क्यों खाई? क्या घर का ताजा मक्खन कम पड़ गया था?'
नन्हे कृष्ण ने तुरंत अपने दोनों हाथ पीछे कर लिए। उन्होंने बहुत मासूम चेहरा बनाकर कहा, 'नहीं मैया, ये सब झूठ बोल रहे हैं। खेल में हारने की वजह से भैया बलराम और मेरे सखा मुझसे चिढ़ गए हैं। मैंने बिल्कुल माटी नहीं खाई।'
'मुख खोलो कान्हा' - जब मां ने सच जानना चाहा
कान्हा की इस बाल-सुलभ चतुराई को देखकर मैया का गुस्सा थोड़ा शांत हुआ, लेकिन मां का मन तो मां का ही होता है। उन्हें पक्का करना था कि बालक सच बोल रहा है या झूठ। यशोदा जी ने गंभीर स्वर में कहा, 'अच्छा, अगर तूने माटी नहीं खाई, तो अपना मुख खोलकर मुझे दिखा।'
भगवान कृष्ण तो पूरी सृष्टि के स्वामी हैं, लेकिन इस समय वे यशोदा के लाडले पुत्र की भूमिका निभा रहे थे। वे जानते थे कि मां के सामने ज्यादा देर तक बात छिपाई नहीं जा सकती। उन्होंने बिना किसी डर के अपनी दोनों आंखें मटकाईं और धीरे से अपना नन्हा सा मुख खोल दिया।
जैसे ही नटखट गोपाल ने अपना मुख पूरा खोला, वहां का दृश्य पूरी तरह बदल गया। मैया यशोदा ने सोचा था कि मुंह में थोड़ी सी पीली या काली मिट्टी चिपकी दिखेगी। पर वहां जो दिखाई दिया, उसकी कल्पना किसी ने सपने में भी नहीं की थी।
मुख के भीतर दिखा अनंत ब्रह्मांड का रहस्य
यशोदा मैया ने कान्हा के उस नन्हे से मुख के अंदर झांका, तो उनकी आंखें खुली की खुली रह गईं। वहां कोई मिट्टी का कण नहीं था, बल्कि साक्षात पूरा ब्रह्मांड घूम रहा था।
श्रीमद्भागवत के अनुसार, उस छोटे से मुख के भीतर यशोदा जी को क्या-क्या दिखाई दिया:
- चमकते हुए सूरज, शीतल चंद्रमा और अनगिनत घूमते हुए तारे
- विशाल पर्वत, घने जंगल, बहती हुई नदियां और सातों गहरे समुद्र
- दिशाएं, तेज हवाएं, अग्नि, आकाश और समय का पूरा चक्र
- तीनों लोकों के सभी जीव-जंतु, देवता, मनुष्य और पशु-पक्षी
हैरानी की पराकाष्ठा तब हुई जब यशोदा जी ने उस ब्रह्मांड के भीतर गोकुल को भी देखा। गोकुल में उन्होंने नंद बाबा का घर देखा, आंगन देखा, और उस आंगन में खुद को कान्हा के मुख में झांकते हुए देखा। एक क्षण के लिए यशोदा जी का सिर चकरा गया कि यह सच है या कोई बहुत गहरा सपना।
यशोदा का संशय और भगवान की माया का आवरण
यशोदा मैया भीतर तक डर गईं। वे सोचने लगीं, 'क्या मैं किसी माया के जाल में फंस गई हूं? या मेरे मस्तिष्क में कोई भ्रम हो गया है? या फिर मेरा यह लाडला कोई साधारण बालक न होकर साक्षात परमेश्वर है?'
भगवान कृष्ण ने देखा कि उनकी मैया बहुत ज्यादा हैरान और भयभीत हो गई हैं। अगर मैया के मन में यह भाव आ गया कि कान्हा भगवान हैं, तो उनका वह सहज और निस्वार्थ वात्सल्य प्रेम खत्म हो जाएगा। वे फिर कभी कान्हा को अपनी गोद में बिठाकर प्यार से दूध नहीं पिला पाएंगी, न ही शरारतों पर डांट पाएंगी।
कान्हा ने तुरंत अपनी वैष्णवी माया का पर्दा मां की बुद्धि पर डाल दिया। अगले ही पल यशोदा जी उस अलौकिक दृश्य को पूरी तरह भूल गईं। उन्हें बस इतना याद रहा कि सामने उनका छोटा सा बेटा मुंह खोले खड़ा है और उसके मुख में कोई मिट्टी नहीं है।
मां का दिल फिर से वात्सल्य से भर उठा। उन्होंने तुरंत अपनी छड़ी फेंक दी, कान्हा को सीने से चिपटा लिया और उनके माथे को चूमने लगीं। भगवान फिर से एक साधारण बच्चे बन गए और मां के आंचल में छिपकर मुस्कुराने लगे।
इस पावन कथा से हमारे जीवन की सीख
कान्हा के मुख में ब्रह्मांड दिखने की यह कथा केवल एक चमत्कार की घटना नहीं है। इसके पीछे जीवन का एक बहुत गहरा दर्शन छिपा हुआ है, जो आज के समय में हमारे लिए और भी ज्यादा जरूरी है:
- छोटे में भी बड़ा रूप देखना: हम अक्सर जीवन की छोटी-छोटी चीजों को नजरअंदाज कर देते हैं। यह कथा बताती है कि प्रकृति के सबसे छोटे कण में भी पूरा संसार और परमात्मा की ऊर्जा बसी हुई है।
- अहंकार से मुक्ति: यशोदा मैया को जब ब्रह्मांड दिखा, तो उनका यह घमंड पल भर में टूट गया कि वे भगवान की स्वामी हैं। जीवन में हमें भी याद रखना चाहिए कि हम चाहे कितने भी साधन जुटा लें, इस विराट ब्रह्मांड के सामने हम बहुत छोटे हैं।
- ज्ञान से बड़ा प्रेम: भगवान ने यशोदा जी से अपना ईश्वरीय रूप छिपा लिया और उन्हें केवल मां का प्यार दिया। यह सिद्ध करता है कि भगवान को पाने के लिए बहुत कठिन ज्ञान या तपस्या से ज्यादा जरूरी है सच्चा और सरल भाव।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब भी मन अशांत हो, तो इस बाल लीला को याद कीजिए। अपने बच्चों में, अपने परिवार में और ईश्वर की बनाई हर छोटी रचना में उसी असीम शक्ति को देखने का प्रयास कीजिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कान्हा ने मिट्टी क्यों खाई थी?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, कान्हा ने मिट्टी इसलिए खाई थी ताकि वे अपनी मैया को यह दिखा सकें कि पूरी पृथ्वी और सृष्टि उन्हीं के भीतर समाई हुई है।
यशोदा मैया ने कान्हा के मुख में क्या देखा था?
यशोदा मैया ने कान्हा के मुख में समस्त ब्रह्मांड देखा, जिसमें सूर्य, चंद्रमा, तारे, नदियां, पर्वत और यहां तक कि स्वयं गोकुल और अपनी छवि भी शामिल थी।
ब्रह्मांड देखने के बाद यशोदा जी को क्या हुआ?
यशोदा जी अत्यंत हैरान और भयभीत हो गई थीं, जिसके बाद भगवान कृष्ण ने अपनी माया से उस अलौकिक दृश्य की स्मृति को मिटाकर उनका वात्सल्य प्रेम फिर से लौटा दिया।



