शक्ति के घमंड में चूर रावण
कल्पना कीजिए एक ऐसे योद्धा की, जिसे अपनी शक्ति पर इतना अभिमान हो कि वो सृष्टि के केंद्र, देवों के देव महादेव के निवास स्थान को ही अपनी जगह से हिलाने की सोच ले। यह कथा है लंका के राजा रावण की, जिसकी शक्ति और ज्ञान का कोई मुकाबला नहीं था, पर जिसके अहंकार की भी कोई सीमा नहीं थी। रावण ने ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या करके अनेकों वरदान पाए थे। इन वरदानों ने उसे लगभग अजेय बना दिया था और तीनों लोकों में उसके नाम का डर फैल गया था। देवता, यक्ष, गंधर्व, सभी उसके बल के आगे कांपते थे।
इसी शक्ति के नशे में एक दिन रावण अपने पुष्पक विमान पर सवार होकर दुनिया पर विजय पाने के लिए निकला। अपनी यात्रा के दौरान वह एक सुंदर और शांत पर्वत के पास से गुज़र रहा था। उस पर्वत का नाम था कैलाश, भगवान शिव और माता पार्वती का पवित्र निवास। जैसे ही रावण का विमान कैलाश के ऊपर से गुज़रने लगा, वह अपने आप रुक गया। विमान अपनी पूरी शक्ति लगाने पर भी एक इंच आगे नहीं बढ़ पा रहा था। रावण हैरान और क्रोधित हो गया। उसे समझ नहीं आया कि कौन सी शक्ति उसके मार्ग में बाधा बन रही है।
तभी उसे सामने नंदीश्वर, भगवान शिव के प्रिय गण और वाहन, दिखाई दिए। नंदी ने विनम्रता से रावण को रोका और कहा, 'हे लंकेश! इस समय भगवान शिव और माता पार्वती विहार कर रहे हैं। इस पर्वत पर किसी को भी आगे जाने की अनुमति नहीं है। कृपा करके आप यहीं रुक जाएं या अपना मार्ग बदल लें।'
नंदी के शब्द सुनकर रावण का अहंकार जाग उठा। उसने नंदी के वानर जैसे मुख का उपहास उड़ाते हुए कहा, 'अरे वानर! तू मुझे रोकेगा? तू नहीं जानता कि मैं कौन हूँ? मैं तीनों लोकों का स्वामी, पराक्रमी रावण हूँ!' इस अपमान से आहत होकर नंदी ने रावण को श्राप दिया, 'हे रावण! तूने मेरे वानर रूप का अपमान किया है, जा! वानरों के हाथों ही तेरा और तेरे कुल का सर्वनाश होगा।'
जब रावण ने हिला दिया कैलाश पर्वत
नंदी के श्राप की परवाह किए बिना, रावण का क्रोध और बढ़ गया। उसने सोचा कि यह पूरा पर्वत ही मेरे रास्ते का काँटा है। क्यों न मैं इस पर्वत को ही जड़ से उखाड़कर फेंक दूँ? यह सोचकर वह विमान से उतरा और अपने असली, विशाल रूप में आ गया। उसने अपनी बीस भुजाओं को कैलाश पर्वत के नीचे लगाया और अपनी पूरी शक्ति से उसे उठाने लगा।
रावण का बल असाधारण था। उसके ज़ोर लगाते ही विशाल कैलाश पर्वत कांपने लगा। पेड़-पौधे हिलने लगे, पत्थर खिसकने लगे और वहां रहने वाले जीव-जंतु डरकर इधर-उधर भागने लगे। पर्वत के इस कंपन से माता पार्वती भी थोड़ी चिंतित हो गईं और उन्होंने भगवान शिव से इसका कारण पूछा।

महादेव तो अंतर्यामी थे, वे सब कुछ जानते थे। उन्होंने माता पार्वती को शांत करते हुए मुस्कुराकर देखा। उन्हें रावण के इस बचकाने और अहंकार भरे कृत्य पर क्रोध नहीं आया, बल्कि उन्होंने उसे एक सबक सिखाने का निश्चय किया।
महादेव का एक अंगूठा और रावण का चीत्कार
एक ओर रावण अपनी पूरी ताकत से कैलाश को हिला रहा था, वहीं दूसरी ओर भगवान शिव शांत भाव से बैठे थे। उन्होंने बस खेल-खेल में अपने दाहिने पैर का अंगूठा ज़मीन पर धीरे से दबा दिया।
जैसे ही शिव का अंगूठा पर्वत से छुआ, सारा खेल बदल गया। जो कैलाश पर्वत कुछ क्षण पहले रावण के बल से कांप रहा था, वह अब लोहे की तरह भारी और स्थिर हो गया। इतना ही नहीं, उस पर इतना भार बढ़ गया कि वह वापस अपनी जगह पर आकर टिक गया। इस अचानक हुए बदलाव से रावण संभल नहीं पाया और उसकी बीसों भुजाएं पर्वत के नीचे बुरी तरह दब गईं।
पर्वत का असहनीय भार पड़ते ही रावण की सारी शक्ति और अहंकार पल भर में चूर-चूर हो गया। वह दर्द के मारे ज़ोर-ज़ोर से चीखने लगा। उसका चीत्कार या 'रव' इतना भयानक था कि तीनों लोक कांप उठे। कहते हैं कि इसी दर्दनाक चीत्कार (रव) के कारण ही उसका नाम 'रावण' पड़ा, यानी 'जो ज़ोर से चीत्कार करे'।
रावण ने अपनी पूरी कोशिश की, लेकिन वह अपनी भुजाओं को इंच भर भी हिला नहीं सका। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ। उसे समझ आ गया कि उसने अपनी शक्ति के घमंड में किससे टकराने की भूल कर दी है।
पश्चाताप की अग्नि और शिव तांडव स्तोत्र की रचना
हज़ारों वर्षों तक रावण उसी पर्वत के नीचे दबा, असहनीय पीड़ा सहता रहा। उसका घमंड अब पश्चाताप की अग्नि में जल रहा था। तब उसके मंत्रियों ने उसे सलाह दी कि जिस महादेव ने तुम्हें यह दंड दिया है, केवल वही तुम्हें इस पीड़ा से मुक्त कर सकते हैं। उनकी शरण में जाओ और उनकी स्तुति करो।
तब रावण ने अपनी भूल को स्वीकार करते हुए, दर्द में ही भगवान शिव की स्तुति करनी शुरू की। उसने अपने एक सिर को काटकर, अपनी आँतों को निकालकर, उससे एक वीणा बनाई और उस पर शिव के गुणों का गान करने लगा। भक्ति और पश्चाताप से भरे हृदय से उसने एक अद्भुत स्तोत्र की रचना की, जिसे आज हम 'शिव तांडव स्तोत्र' के नाम से जानते हैं।
भक्ति ने अहंकार पर विजय पाई
उसकी स्तुति में इतना दर्द, इतनी भक्ति और इतनी सच्चाई थी कि कैलाशपति महादेव का हृदय पिघल गया। वे रावण की भक्ति से प्रसन्न हुए। उन्होंने न केवल अपना अंगूठा हटाकर उसे मुक्त किया, बल्कि उसे 'रावण' नाम भी दिया और उसे एक दिव्य खड्ग 'चंद्रहास' भी भेंट किया। शिव ने उससे कहा कि इस तलवार का सम्मान करना, अन्यथा यह मेरे पास वापस आ जाएगी।
इस तरह, जिस अहंकार ने रावण को विनाश के कगार पर पहुँचाया था, उसी रावण को उसकी भक्ति ने बचा लिया। यह कथा दिखाती है कि भगवान शिव जितने भोले हैं, उतने ही कठोर भी हैं। वे अहंकार को तोड़ते हैं, लेकिन सच्ची भक्ति और पश्चाताप को हमेशा स्वीकार करते हैं।
निष्कर्ष: शक्ति और भक्ति का सच्चा अर्थ
रावण और कैलाश पर्वत की यह कथा सिर्फ एक पौराणिक कहानी नहीं है, बल्कि आज के जीवन के लिए एक बहुत गहरा सबक है।
- अहंकार का पतन निश्चित है: यह कथा हमें सिखाती है कि शक्ति, पद या ज्ञान का अहंकार व्यक्ति को अंधा बना देता है। रावण के पास सब कुछ था, पर उसका घमंड ही उसके पतन का कारण बना। आज के जीवन में भी, जब हमें थोड़ी सफलता मिलती है, तो हम अपनी सीमाओं को भूल जाते हैं। यह कहानी हमें विनम्र रहना सिखाती है।
- शक्ति का सही उपयोग: महादेव ने रावण को दंड देकर यह संदेश दिया कि शक्ति का उपयोग विनाश के लिए नहीं, बल्कि रक्षा और कल्याण के लिए होना चाहिए। जब शक्ति का दुरुपयोग होता है, तो उसका अंत निश्चित है।
- पश्चाताप का महत्व: गलती हर इंसान से होती है, लेकिन अपनी गलती को मानकर सच्चे मन से पश्चाताप करना ही महानता है। रावण ने जब अपनी गलती मानी और भक्ति का मार्ग अपनाया, तो भगवान ने भी उसे क्षमा कर दिया। यह हमें जीवन में दूसरा मौका मिलने और उसे सही तरह से उपयोग करने की प्रेरणा देता है।
अंत में, यह कथा हमें बताती है कि सच्ची शक्ति बाहरी बल में नहीं, बल्कि आंतरिक विनम्रता और भक्ति में है। जब हम अपनी क्षमताओं को ईश्वर की कृपा मानते हैं, न कि अपनी उपलब्धि, तभी हम सही अर्थों में शक्तिशाली बनते हैं।



